कुम्भ डायरी

तम्बुओं के शहर में

बचपन से सुनता आया था कि मेरी नानी जौनपुर के दूरस्थ अंचल में बसे गांव भौदेपुर से पैदल चलकर प्रयाग तक गई थीं। कुंभ पड़ा था सो संगम नहाने। बात इतनी पुरानी नहीं कि रेल या मोटर थी ही नहीं। पैदल जाना उनका संकल्प था, शायद इस भावना के वशीभूत कि ज्यादा कष्ट यानी तप का पुण्य ज्यादा। वर्षों बाद मैं भी गया बरेली से, किसी पुण्य की तलाश या मोक्ष का आकांक्षी बनकर नहीं, अपने अख़बार के लिए काम करने और ट्रेन में गया। बचपन में सुने किस्सों से बने कुंभ की भव्यता का जो स्वरूप अवचेतन में था, दरअसल उससे कहीं ज्यादा भव्य और विराट है कुंभ का मेला, ज्यादा रंगों और विविधताओं वाला।

मीलों का सफर और हजारों-लाखों की भीड़। सिर पर गठरी, हाथ में खाली गंगाजली, लोटा या बोतल और भीड़ में खो जाने की आशंका से घबराये एक दूसरे का हाथ या कपड़े पकड़कर आगे बढ़ते लोगों के बीच रह-रहकर जै गंगामइया का उद् घोष। एक ही कामना कि किसी तरह संगम तक पहुंचकर डुबकी लगा लें और वहां से जल लेकर लौट सकें। अनचिन्हें चेहरों वाले इस अथाह जनसमूह में भारतीय जीवन के तमाम रंग होते हैं और चेहरों पर आस्था की अमिट इबारत। ये वही लोग हैं जिन्हें संगम में स्नान के लिए हर तकलीफ कबूल है, जिनको सरकारी इंतजामों और सहूलियतों से बहुत सरोकार नहीं। खुले आकाश के नीचे गंगा की नरम रेत से ज्यादा नरम और गुदगुदे बिस्तर की उन्हें दरकार नहीं। अपना ओढऩा-बिछौना, सफ़र का खाना-पीना और यहां तक कि पकाने के लिए अपना ईंधन यानी पूरी गृहस्थी अपने झोले, बोरे या बक्से में साथ लेकर चलने वालों से ही जुटता है कुंभ का मेला और ये ही वो लोग हैं जो इसे विराटता देते हैं।
इलाहाबाद में कुंभ की परम्परा और मान्यताओं को लेकर हाल ही कई शोध चर्चा में रहे हैं। सभी शोध के निष्कर्ष मेले के बारे में प्रचलित पौराणिक आख्यान को नकारते हुए इसकी शुरुआत को डेढ़ सौ साल से ज्यादा पुराना नहीं मानते। इलाहाबाद में हर साल जुटने वाला माघ मेला अलबत्ता इसका अपवाद है। शोध के नतीजे अपनी जगह, मेले की मार्केटिंग के अफसरों और महामण्डलेश्वरों के फंडे भी दरकिनार लेकिन इस मेले में बेहद खामोशी से जुटने वाली लाखों-लाख की भीड़ का सरोकार उन्हें संस्कार में मिले संगम नहान के महात्म्य और गंगा की पवित्रता में सन्निहित है। प्रदूषण के तमाम हो-हल्ले के बावजूद गंगा में उनकी श्रद्धा में रत्ती भर फर्क नहीं आया है। घाटों पर भीड़ का दबाव रोकने के लिए ऐसे लोगों को मीलों तक घुमाते रहने की व्यवस्था से भी उन्हें कोई शिकायत नहीं। ये लोग तो बस चलते हुए नज़र आते हैं, संगम की तरफ, अरैल की तरफ, झूंसी की तरफ, जिधर राह मिल जाए या जिधर कोई उन्हें बता दे। डुबकी लगाकर निकलने से पहले सूर्य की ओर मुंह करके अंजुली में गंगाजल भरकर अर्घ्य और बाहर निकलने के बाद जहां जगह मिलती है वहीं थोड़ा रोली, अक्षत, फूल चढ़ाकर गंगा की आरती। आगे बढ़कर बांध पर बड़े हनुमान जी के दर्शन, मौका लगा तो किले की पातालपुरी में भी एक चक्कर, जहां सचमुच वाला अक्षय वट तो नहीं है मगर सिंदूर के तमाम तिलक और कलावा के धागे के बीच खड़े एक मोटे तने को अक्षय वट मानकर सिर झुकाते हैं तमाम लोग। जिसे अक्षय वट कहते हैं, वह तो किले की तरह ही सेना की हिफाजत में है और बहुत समर्थ लोग ही वहां तक पहुंच पाते हैं। कुछ गउदान का सोचकर घर से निकलते हैं सो बछिया की पूंछ पकड़कर हाथ में रोली-अक्षत और नोट लेकर संकल्प पूरा करते हैं और जो कुछ हथेली में हुआ बछिया के मालिक को ही देकर पूरे संतोष से आगे बढ़ते हैं। पूरे रास्ते पर नाना वेश-भूषा में दान ग्रहण करके तीर्थ का पुण्य दिलाने वालों के पैंतरे अब भी इनकी समझ में नहीं आते, सो जेब की रेज़गारी रास्ते भर कम होती जाती है। इनके अलावा छोटे-छोटे बच्चे मिल जाएंगे जो पैसे मांगते हुए लोगों की जोड़ी सलामत रहने या घर को बच्चों से भरा-पूरा होने का आशीर्वाद देते हैं। इतने के बाद जहां जगह मिली, कुनबे और संगियों के साथ जम जाते हैं, वहीं खाना बनाना, खाना और सोना भी। लीजिए तीरथ का कारज पूरा हुआ।
मगर इंतजामिया के लिए ये बहुसंख्य लोग भीड़ से ज्यादा कुछ नहीं। ऐसी भीड़ जिसका कोई चेहरा नहीं होता, ऐसी भीड़ जो सिर्फ आंकड़ा है- कुंभ के महात्म्य के बखान में काम आने वाला आंकड़ा। इनके लिए उतना सोचने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती जितनी कि कल्पवास के लिए आने वालों के लिए। ये लोग आएंगे, अपने बूते रहेंगे और फिर चले जाएंगे। वर्षों से ऐसा ही होता आया है। न यकीन हो तो जिन ट्रेनों या बसों से सफर करके ये लोग यहां तक पहुंचते हैं, उनका हाल देख सकते हैं। हल्ला तमाम खास रेलगाड़ियों और बसों का मगर टिकट के साथ मेला टैक्स भी भरने वाले इन लोगों की भीड़ को ट्रेन या बस में अंदर बैठने की जगह मिल जाए, यह भी जरूरी नहीं।
इसके ठीक उलट एक तबका ऐसा भी है जो तमाम सहूलियतों के साथ यहां रहते हुए पुण्य की आकांक्षा करता है। इनके लिए तमाम इंतजामात होते हैं और कई बार तो धूल में पांव रखने की ज़हमत नहीं करनी पड़ती। इस तबके के लोगों के चेहरे तो होते ही हैं, इनके व्यापक आभामंडल में ही पूरा मेला जगमग करता लगता है। ये हैं संत-महंत, श्री-श्री 1008 या फिर महामंडलेश्वर की पदवी वाले लोग, बड़ी-बड़ी मोटरों में, कीमती कपड़ों में सजे, कुंदन काया वाले भक्त जो बंगलों-कोठियों का आराम छोड़कर धूल-धक्कड़ वाले मेलों तक आते हैं, गुरू जी की सेवा करते हैं और पुण्य संचित करते हैं, इंतजामिया के हाकिम-हुक्काम। पूरे मेले में और शहर में भी बड़े-बड़े होर्डिंग्ज़, बैनर और पोस्टर सिर्फ उन कंपनियों के नहीं मिलते जो अपने उत्पाद के प्रचार और बिक्री के लिए यहां जुटते हैं, इन बाबाओं और महात्माओं के भी मिलते हैं। बाज़ार के इस दौर पब्लिसिटी के लोभ से भला कौन बच पाता है। होर्डिंग्ज़ के साइज़, उनकी संख्या, क्वालिटी और उस पर बाबाजी की फोटो के साइज़ से उनके भक्तों के स्टेटस का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। यह तबका ही मेले की प्रचलित छवि गढ़ने के काम आता है और इसमें मदद करता है मीडिया। महाकुंभ में करीब दो महीने तक संगम के किनारे बसे तम्बुओं के शहर में मैं भी रहा। अनजान चेहरों वाली लाखों लोगों की उस भीड़ का हिस्सा बनकर जो कुछ देखा, समझा-जाना, कुंभ डायरी उसी का लेखा-जोखा है। समूचा न सही, थोड़ा ही। बाद में अर्द्ध कुंभ में भी गया इलाहाबाद मगर इस बार थोड़े समय ही रुक सका। डायरी के आखिरी पन्ने इन्हीं दिनों में लिखे गए।
बाद के वर्षों में जब कुंभ पर निर्मल वर्मा और मार्क टुली की रिपोर्ट्स पढ़ीं तो एकबारगी अफसोस हुआ। काश, इन्हें पहले पढ़ लिया होता। फिर लगा कि शायद यह अच्छा ही हुआ। नयेपन का तर्जुबा यों ही मिल सकता था शायद। पहली बार गया था तो सारे अनुभव इतने टटके थे कि रोमांच हो आता। सुनील उमराव और प्रवीण सिंह हमेशा साथ रहे सो उनके तर्जुबे से इस आसान दिखने वाले मगर बेहद जटिल और बहुस्तरीय आयोजन को समझना आसान हुआ। तमाम मौकों पर संजय बनौधा ने बहुत साथ दिया है। इन दोस्तों के बिना ये अनुभव मुमकिन नहीं थे। सभी दोस्तों का शुक्रिया।

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1 टिप्पणी

  1. सबसे पहले तो ये की शुक्र है की आप मिल गये. पिछले कई दिनो से काफ़ी खोजा लेकिन आपका ब्लॉग तो जैसे कुंभ के मेले मे बिछड़े हुए भाई की तरह हो गया था. ये कोई हाई स्कूल की बात है, कुंभ के मेले मे मेरे नाना नानी जा रहे थे. फ़ैज़ाबाद से उन्हे ट्रेन मे बैठना था. लेकिन ट्रेन मे बैठना तो दूर, खड़े होने या लटकने की जगह नही थी. मैं और मेरी मौसी के लड़के ने बड़ी मुश्किल से ट्रेन मे बने बाथरूम के बगल एक आदमी के खड़े होने की जगह छीका ली थी. अम्मा का जुगाड़ तो हो गया था, बाबू किसी तरह लटकने मे कामयाब हो गये थे. लौटकर उन्होने बताया की प्रतापगढ़ मे कुछ लोग उतरे तो अंदर घुसने की जगह मिल गयी थी. लेकिन अम्मा से मुलाकात तो प्रयाग स्टेशन पर ही हो पाई. कुंभ पर शोध करने वालों की रिपोर्ट्‌स तो मैने नही पढ़ी, लेकिन कुंभ के मौसम मे कुंभ सिर्फ़ इलाहाबाद मे ही नही दिखाई देता. आस पास 500 किलोमीटर तक कुंभ ही कुंभ दिखाई देता है, मानो इलाहाबाद एक कुंभ हो और दुनिया भर की भीड़ उस घड़े की तरफ बेतहाशा भागी जा रही हो…


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