पूरे बीस दिन तक खूब धमाल रहा। पवित्रता, आस्था और परम्पराओं का फिर संगम हुआ, समय के साथ बदल रही मान्यताओं और आधुनिक तकनीकी का मिलन भी। इस महाकुंभ में आस्थावानों की भारी भीड़ पर भी हावी रहे टेलीविजन के चैनल, वेबसाइटों के महारथी, विदेशियों के कैमरे, लैपटॉप-मोबाइल, इंतजामिया के नाम पर नादिरशाही और महाभव्य पंडालों में महाभव्य प्रभामंडल बिखरते महासंत। खाद के प्लास्टिक के बोरों में चार दिन की गृहस्थी अपने सिर पर लादे, संगम के आसपास मीलों तक पसरी रेत पर खुले में ही पड़े रहे और प्लास्टिक की बोतलों-डिब्बों में पवित्र गंगा का मटमैला पानी भर लेकर अपने घरों को लौटती भीड़ साफ तौर पर उन लोगों से बिल्कुल अलग थी, जो शफ़्फ़ाक कपड़ों में बनाए गए डेरों और कमरों में रुककर अपने आदर्श महात्माओं का आशीर्वाद लेने जुटे थे। ये लोग महात्माओं के लिए कीमती तोहफे लाए थे। कहां खाएंगे, कहां रहेंगे, जैसी चिन्ताओं से एकदम बेफ़िक्र। यह बेफ़िक्री उनके चेहरे पर साफ झलकती रही। दूसरों की तरफ उन्हें न तो मीलों तक धक्के खाने थे, न ही घर वापसी के लिए संसाधनों की चिन्ता। ऐसे ही कुछ वाकयों से साक्षात्कार की बानगी:
कृष्ण चरित्र अंग्रेजी में
मथुरा में जन्मे कृष्ण का जीवन-चरित्र और दर्शन दुनिया के तमाम मुल्कों के लोगों को समझाने का जिम्मा उठाए इस्कॉन के लोगों ने मेले में दो पंडाल लगाए। एक में प्रतिमाओं और चित्रों से भगवान कृष्ण के जीवन की झांकी और भक्तों के लिए मुफ्त प्रसाद का इंतजाम तो दूसरे में प्रभुपाद की भव्य मूर्तियों के साथ ही कृष्ण के जीवन के विभिन्न प्रसंगों पर ढेर सारी आकर्षक प्रतिमाओं वाली झांकियां, मगर चारों ओर से बांस की खपच्चियों से बनी बाड़ और इसमें दाखिल होने का एक ही विकल्प-दस रुपये की एक किताब।
इटली में जन्मे और कलकत्ता में इस्कॉन के उपाध्यक्ष बाबा सात्विक दास इस शिविर के प्रभारी हैं। अलग-अलग प्रसंग समझाते हैं अंग्रेजी में। दिस इज कृष्ण एण्ड बलराम विद देयर फ्रेंड्स, काउज आर ग्रेजिंग। (इस दृश्य में कृष्ण सखाओं के बीच सुदामा भी हैं, जिनके एक हाथ में मिनरल वॉटर की खाली बोतल भी दिखाई देती है।) दिस इज दशावतार एण्ड दैट ऑक्स विद ब्रोकन लेग्ज़ रिप्रेजेंट्स द रेलिजन। इट हैज बिकम लाइक एन ऑक्स बिदआउट लेग्ज़। ऐन सामने की तरफ देवकी के ब्याह के बाद उन्हें ससुराल छोडऩे जा रहे कंस की गुस्सैल चेहरे वाली प्रतिमा है। आकाशवाणी से विचलित कंस देवकी को मारने पर आमादा है, वासुदेव दैन्य भाव लिए बचाने के आगे खड़े हैं और आस-पास की भीड़ भौचक है। सात्विक दास विश्लेषण करते हैं, ‘ दिस इज़ कम्स, कैरियिंग हिज सिस्टर देवकी इन चैरियट टु हर इन-लॉज हाउस। यू सी इन हिन्दूज़ इट्स ट्रेडिशन, ब्रदर कैरीज सिस्टर टु इन-लॉज हाउस। बट आन द वे, ही हर्ड गॉड्ज वॉयस, ओ कम्स द एर्थ सन ऑफ देवकी विल किल यू। कम्स गॉट एंग्री एण्ड टुक आउट हिज स्वोर्ड टु किल देवकी, हिज ओन सिस्टर। यू सी हिज ओन सिस्टर, व्हाट अ रास्कल ही वाज़। बट वासुदेवा प्रोमिज्ड टु गिव ऑल देयर बेबीज टु कम्स। वासुदेवा वॉज अ वाइजमैन।’ यह कथाक्रम चलता रहता है। कंस के लिए रास्कल विशेषण का इस्तेमाल पहली बार सुना था। जिस देश की मिट्टी में राम-कृष्ण की गाथा पीढ़ी दर पीढ़ी हजारों साल से गूंथी-मिली हो, उसी जमीन पर यह भावनाशून्य किस्सागोई किसी अजूबे से कम नहीं। फिर भी हजारों-हजार किताबें बिकीं। कितनों ने हाथ जोड़े, योगीराज के बालरूप के आगे खड़े होकर।
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